संघर्ष के साए में मोहब्बत Love in the shadow of struggle


संघर्ष के साए में मोहब्बत Love in the shadow of struggle

शुरुवात से अंत तक जरूर पढ़ें।


1. परिचय

रत्ना और आलोक, दोनों ही मध्यप्रदेश के एक छोटे कस्बे — उज्जैन — में पले‑बढ़े। उज्जैन की सुबह से शाम तक गूंजते महाकाल मंदिर की घंटियाँ, गर्मियों की तेज धूप, सर्दियों की झिझकती हवा की खनक — सब उन्होंने मिलकर जिया था। लेकिन दोनों की ज़िंदगी की राहें अलग थीं; फिर भी एक अनदेखे कतरे की तरह वे जुड़ गईं।

2. पहले मिलन की निशानी

रत्ना का परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था। माता‑पिता दोनों मजदूरी करते, ताकि बेटी को पढ़ाई‑लिखाई में किसी तरह सहयोग कर सकें। आलोक उस्ताद परिवार से था, जहाँ पिता इंजीनियर थे और माँ स्कूल की शिक्षिका। हाई स्कूल की गणित की क्लास में पहली बार रत्ना और आलोक की मुलाकात हुई।

गणित के जटिल सवालों को हल करते समय आलोक ने रत्ना को मदद की पेशकश की। इससे शुरुआत हुई छोटी‑छोटी बातचीत की — होमवर्क, स्कूल, गाँव‑शहर की बातें। रत्ना को आलोक का संवेदनशील व्यक्तित्व और शांत स्वभाव आकर्षित करते गए, वहीं आलोक को रत्ना की मेहनत, ईमानदारी और मुस्कुराहट ने मोहित किया।

3. दोस्ती से होने लगी चाहत

समय बीतता गया, दोस्ती प्यार में बदलने लगी। उन्होंने अपने दिल की बात कभी ज़ुबानी कही नहीं, पर आँखों से ज़रूर। एक दिन स्कूल की लाइब्रेरी में, जब रत्ना का प्रोजेक्ट लैब रिपोर्ट खो गया, आलोक ने रात भर कंप्यूटर खुला रखा और मदद की — बिना किसी स्वार्थ के। उस रात उनकी दोस्ती एक कदम आगे बढ़ी।

मगर प्यार का रास्ता आसान नहीं था। रत्ना की आर्थिक स्थिति और कक्षा की प्रतियोगिताएँ — सब मन में सवाल उठाते: क्या आलोक को मेरे साथ रहना पसंद होगा? क्या मेरे परिवार की गरीबी उसे ठहराएगी?

4. परिवार का विरोध

स्कूल खत्म होने के बाद, आलोक ने इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया दिल्ली विश्वविद्यालय में। रत्ना ने स्नातक की पढ़ाई उज्जैन से शुरू की। दूरी बढ़ी, पर दोनों की बात‑चीत रोज़ सोशल मीडिया और फोन से होती रही।

एक दिन आलोक ने अपने घर से बताया कि उनके परिवार को रत्ना के संबंध से कोई ख़ुशी नहीं है। उनका कहना था, “वह किसी सामाजिक रूप से उपयुक्त पृष्ठभूमि से नहीं है। हमारे ऐतिहासिक प्रतिष्ठान के लिए यह सही नहीं।”

रत्ना पूरी तरह टूट गई। उसे लगा कि खुशियों की दुनिया में प्रवेश करना उसके बस की बात नहीं। लेकिन आलोक ने दृढ़ता से झटकार दिया: “हम ऐसा प्यार नहीं चाहते जो सामाजिक सिफारिशों पर टिके। जो प्यार सच्चा हो, वह तो दिल से जुड़ा होता है।”

5. संघर्षों की शुरुआत

इतनी सी बात ने बहुत कुछ बदल दिया। आलोक ने दिल्ली में पढ़ाई जारी रखी, पर उसके पिता ने कॉलेज फीसेस बंद कर दीं; उन्हें लगा कि बेटी‑बहू लाने से पहले विचार करना चाहिए। आलोक को खुद मेहनत करनी पड़ी—रात में पार्ट‑टाइम क्लास देने लगे, ताकि कॉलेज की फीस और रहने‑खाने का ख़र्च पूरा हो सके।

रत्ना ने उज्जैन में घर से निकले बिना घर का समर्थन स्वीकृत किया। उसने ट्यूशन देना शुरू किया आसपास के बच्चों को। पर उसके माता-पिता ने यह भी माना कि आलोक के परिवार से रिश्ते में कठिनाइयाँ हैं। फिर भी उन्होंने रत्ना का हौसला बढ़ाया: “जो सही हो, समय पर साबित होता है।”

6. दूरी ने बढ़ाई दूरी

दिया प्यार की, पाया तनहा सफ़र — ऐसे पलों की शुरुआत होती है जब दोनों की दूरियाँ बेतरह बढ़ने लगीं। रत्ना को पढ़ाई के साथ घरेलू ज़िम्मेदारियाँ भी संभालनी थीं, आलोक को काम और पढ़ाई के बीच संतुलन बैठाना था। दोनों की बातचीत पहले की तरह गहरी नहीं रह गई; छोटी‑छोटी बातों की जगह टाल‑मटोल भरे जवाब आ गए।

एक बार रत्ना उदासी में फटड़ी: “तुम्हारा फोन कभी नहीं आता मायने रखता है, पर आलापन तो है ही नहीं।” आलोक शांत रहा पर भीतर से हिल गया। उसे लगा कि प्यार पर्याप्त नहीं हो रहा; उसे अब सामाजिक दबाव, आर्थिक बोझ, पढ़ाई, काम — सब को संतुलित करना था।

7. परीक्षा के समय

इन तनावों के बीच आने लगी परीक्षा की घड़ी। रत्ना ने स्नातक की अंतिम परीक्षा दी; आलोक ने चौथे सेमेस्टर में कुछ महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स— जिनके पूरा होने पर उसे स्कॉलरशिप भी मिल सकती थी— पूरा किया।

रत्ना की परीक्षाओं से पहले तनाव इतना बढ़ गया कि उसने आलोक से दूरी बनाए रखी। आलोक ने खुद को रोककर लिखा:

“मुझे तुमसे दूरी नहीं चाहिए, पर तनाव है, उमस है, और तुमसे दूर रहकर ही मैं तुम्हें कम तकलीफ में रख सकता हूँ।”

रत्ना ने जवाब नहीं दिया। परीक्षा खत्म हुई पर वह अंदर से टूट चुकी थी।

8. एक दुर्घटना और संभलती ज़िंदगी

सन्नाटा टूटा एक दिन उज्जैन से आलोक की कॉल से: “रत्ना, क्या तुम ठीक हो?” रत्ना उत्तर नहीं दे सकी। उसकी माँ ने कहा कि रत्ना faint हो गई थी, अस्पताल में भर्ती है। उसकी परीक्षा की घबराहट, नींद का अभाव, ट्यूशन का बोझ— सब मिलकर उसे नीचे गिरा दिया।

अस्पताल की सफ़ेद रौशनी में, आलोक ने खुद को दोषी माना। उसने तुरंत ट्रेन बुक की और उज्जैन पहुंचा। हॉस्पिटल के कमरे में, रत्ना की बेड साइड पर बैठकर उस ने धीमे स्वर में कहा: “मैं वापिस नहीं जाना चाहता — मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

उसके शब्दों ने रत्ना के नीले होंठों में पहली बार मुस्कान लायी। वह दर्द में भी मुस्कुराई। दोनों की आंखों में पानी आया, पर वह पानी उम्मीद की बूंद बन गया।

9. नया आरंभ

उज्जैन की अस्पताल की चारदीवारी के भीतर भी प्यार ने नया जीवन पाया। आलोक ने अपनी शिक्षा जारी रखी, पर अब रात में कुछ घंटों के बजाय दिन-रात दोनों में मेहनत की। रत्ना ने धीरे-धीरे टेली‑कक्षाएं शुरू की ताकि वह कहीं भी पढ़ा सके।

उनके इस नए सफ़र के लिए सबसे बड़ा सहयोग हुआ एक NGO का, जो गरीब युवाओं को बिना फीस के ऑनलाइन कोर्सेज और स्कॉलरशिप देती थी। आलोक को स्कॉलरशिप मिली और रत्ना को डिजिटल सर्टिफिकेट कोर्सेज में दाखिला मिला। यह सब हुआ तब, जब दोनों ने अपनी ज़िंदगी में संघर्ष को एक साथी की तरह स्वीकार किया।

10. समाज स्वयं बदलता है

समय-समय पर आलोक के माता‑पिता ने देखना शुरू किया कि उनका बेटा जीवन संघर्ष के बावजूद खड़ा है। रत्ना के माता‑पिता ने भी देखा कि आलोक लड़ रहा है, थका नहीं — क्योंकि उस लड़ाई में सचाई थी।

एक दिन आलोक के पिता आए उज्जैन। रत्ना के घर में दोनों परिवारों की मुलाकात हुई। बेमुँह सवालों की जगह सम्मान था, पूर्वाग्रह की जगह आदर। दोनों परिवारों ने समझा:

“यह जो लड़के‑लड़कियाँ हैं, वे संघर्ष कर रहे हैं, पर साथ हैं; उन्होंने मेहनत से ही राह बनाई है, ना कि किस्मत से।”

त्योहार दीपावली के एक शाम — जब दीपों की रोशनी उज्जैन की गलिओं को जगमगा रही थी — दोनों परिवारों ने सामूहिक पूजा की, और नई शुरुआत की अनुमति दी।

11. सफलता की शुरूआत

अलक-रत्ना की मेहनत रंग लाई। आलोक ने दिल्ली से अपनी इंजीनियरिंग पूरी की, एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी मिली। रत्ना ने ऑनलाइन एजुकेशन प्लेटफ़ॉर्म से सर्टिफिकेशन पूरी की और अब गणित‑विज्ञान के विषयों में ट्यूटरिंग करती।

अब उनके पास केवल आर्थिक सम्मान ही नहीं, आत्म‑सम्मान भी था। दोनों ने शिक्षा का महत्व देखा और समाज के पुरानी रुढ़ियों को चुनौती दी। उनकी कहानी बन गई गाँव‑कस्बों में अन्य लड़कियों‑लड़कियों के लिए प्रेरणा।

12. लौटते रिश्ते का रिश्ता

एक दिन आलोक ने उज्जैन से दिल्ली लौटते समय डिग्री सर्टिफिकेट्स की तस्वीर भेजी रत्ना को:

  • इंजीनियरिंग ग्रेजुएशन की डिग्री
  • रत्ना के ऑनलाइन कोर्सेज के सर्टिफिकेट्स
  • साथ में ट्यूशन से मिली तारीफों की रेफरेंस लेटर्स

रत्ना की आंखें रोशनी से भर गईं। उसने महसूस किया कि संघर्ष ने उनके प्यार को एक मुकाम तक पहुँचाया— जहाँ उन्हें भविष्य की एकदूसरे में विश्वास था।

और फिर, दिल्ली‑उज्जैन के बीच एक नई ज़िंदगी की शुरुआत हुई। उन्होंने तय किया कि दिल्ली में एक साथ रहेंगे — रत्ना ने ऑनलाइन पढ़ाई जारी रखी, आलोक का परिवार स्वीकारोक्ति में पूरी तरह शामिल हो चुका था।

13. अंत की उम्मीद

आज जब रत्ना और आलोक अपने छोटे‑से किराये‑के अपार्टमेंट में शाम की चाय पीते हैं, तो पीछे की कहानी याद करके मुस्कुरा लेते हैं:

  • संघर्ष था, सब्र भी था
  • मंजिल थी, रास्ता भी था
  • प्यार था, और विश्वास भी था

उनकी कहानी यही साबित करती है कि जब दो दिल सचमुंच मिल जाएँ, तो समाज की बाधाओं, आर्थिक तंगी और दूरी की दीवारों को भी पार किया जा सकता है। संघर्ष ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि जोड़ दिया — एक नई उम्मीद, एक नया आरंभ।


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