मसीहा बनते कदम steps towards becoming a messiah
शुरुवात से अंत तक जरूर पढ़ें।
1. मिट्टी में जन्मा सपना
बिहार के छोटे से गाँव — मोतिहारी के पास — एक बस्ती थी जिसका नाम तक कोई पूछता नहीं था। वही बस्ती, जहाँ बारिश में कच्चे घर बह जाते, गर्मी में जल की बूँद भी मोहताज होती, और ठंडी में बच्चों के पैरों में चप्पलें तक नहीं होतीं।
अर्जुन का जन्म इसी बस्ती में हुआ था। पिता – एक दिहाड़ी मजदूर। माँ – दूसरों के घरों में झाड़ू‑पोंछा करने वाली। परिवार में पाँच लोग और दो वक्त की रोटी भी अक्सर अधूरी रह जाती थी।
अर्जुन की आँखों में एक सपना था, जो कभी स्कूल की टूटी खिड़की से बाहर झाँकता तो कभी मंदिर के पास लगे अख़बार से झांकता — “एक दिन मैं दूसरों के लिए कुछ करूंगा, ताकि कोई और भूखा ना सोए।”
2. शिक्षा की पहली लड़ाई
गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ाई तो नाम मात्र की होती थी। मास्टर जी कभी आते, कभी नहीं। अर्जुन को किताबें नहीं थीं, बस एक पुरानी कॉपी और टूटी पेंसिल थी। लेकिन उसकी जिज्ञासा बाकी सब बच्चों से अलग थी। वो हर नए शब्द को नोट करता, हर सवाल पर सोचता, और जब कोई जवाब नहीं मिलता तो मंदिर के पास बैठने वाले बुजुर्गों से पूछता।
एक दिन, गाँव में एक NGO की टीम आई। उन्होंने बताया कि अगर कोई बच्चा पढ़ना चाहता है, तो वो उन्हें शाम की कक्षाएँ देंगे। अर्जुन दौड़ पड़ा। उसने अपने काम से लौटकर रोज़ शाम 6 से 8 तक पढ़ाई शुरू कर दी।
उसी समय से अर्जुन के भीतर ज्ञान की भूख और सेवा की भावना दोनों पनपने लगी।
3. छोटे कदम, बड़े सपने
अर्जुन 10वीं में पूरे ब्लॉक में टॉपर बना। जब अख़बार में उसकी फोटो छपी, गाँव वालों की आँखें भर आईं। माँ ने पहली बार कहा — “शायद तू ही हमारा भाग्य बदलेगा।”
NGO ने उसे शहर के अच्छे स्कूल में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप दिलाई। अब अर्जुन ने पटना जाकर इंटर की पढ़ाई शुरू की।
वो सुबह अख़बार बाँटता, दोपहर में एक चाय की दुकान में काम करता और रात को स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ाई करता। लेकिन कभी शिकायत नहीं की। उसके लिए ये सब केवल एक सीढ़ी थी — “ऊपर जाने की सीढ़ी।”
4. सेवा की भावना का बीज
एक बार कॉलेज जाते समय अर्जुन ने देखा — सड़क पर एक आदमी बेहोश पड़ा था। लोग गुजरते गए, किसी ने नहीं पूछा। अर्जुन ने पास की मेडिकल दुकान से ORS मंगवाया, पानी पिलाया और रिक्शा करके अस्पताल ले गया। डॉक्टर ने कहा, “अगर 10 मिनट और देर होती, तो उसकी जान चली जाती।”
उस दिन अर्जुन को लगा, “अगर मेरी पढ़ाई, मेरी मेहनत किसी की जान बचा सकती है, तो यही मेरा रास्ता है।”
यहीं से उसकी सोच बदली। अब वह सिर्फ़ अपनी गरीबी से नहीं, बल्कि समाज की पीड़ा से लड़ना चाहता था।
5. डॉक्टर बनने की जिद
12वीं के बाद अर्जुन ने मेडिकल की तैयारी शुरू की। कोचिंग की फीस कहाँ से आती? उसने दिन में एक ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया, और रात में खुद की पढ़ाई करता।
पहली बार में वो NEET एग्ज़ाम में पास नहीं हुआ। गाँव लौटते समय माँ ने कहा, “थक मत जाना बेटा, तू नहीं रुकेगा तो ये गाँव चलेगा।”
अर्जुन ने फिर से प्रयास किया — इस बार बिना किसी ट्यूशन, बिना नोट्स, केवल इंटरनेट कैफ़े जाकर मुफ्त मटेरियल से पढ़ा। और दूसरे प्रयास में…
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उसे दिल्ली AIIMS में एडमिशन मिला। बस्ती में पटाखे नहीं थे, फिर भी लोग थालियाँ बजाकर जश्न मना रहे थे।
6. डॉक्टर अर्जुन — नाम नहीं, पहचान
AIIMS की चमचमाती बिल्डिंग में जब अर्जुन पहुँचा, तो उसे वो झोपड़ी याद आई जहाँ उसने दीवार पर कोयले से लिखा था — “डॉक्टर अर्जुन कुमार”।
कॉलेज में उसने किताबों के अलावा ‘सेवा’ को भी नहीं छोड़ा। फ्री मेडिकल कैंप लगाता, गरीब मरीजों की मदद करता, और गाँव की झुग्गियों में हेल्थ अवेयरनेस क्लास लेता।
5 साल की मेहनत के बाद, जब वह MBBS डॉक्टर बना, तो उसके पहले मरीज कोई और नहीं, बल्कि उसी NGO की बुजुर्ग दीदी थीं जिन्होंने बचपन में उसे पढ़ाया था।
7. लौट आया मसीहा
डिग्री मिलते ही बड़े अस्पतालों ने ऑफर भेजा: लाखों का पैकेज, विदेश की सुविधाएं।
पर अर्जुन ने सब ठुकरा दिए।
वो सीधा अपने गाँव लौट आया — उसी बस्ती में जहाँ लोग अब भी झोलाछाप डॉक्टरों से इलाज करवाते थे।
उसने गाँव में एक “फ्री हेल्थ क्लिनिक” शुरू किया, जहाँ हर गरीब का इलाज मुफ्त था।
जल्द ही आस‑पास के दर्जनों गाँवों से मरीज आने लगे।
अर्जुन खुद दवाई लाता, खुद ऑपरेशन करता, खुद घर‑घर जाकर हेल्थ कैंप लगवाता।
8. ज़माना बोला — मसीहा आ गया
लोग अब अर्जुन को डॉक्टर नहीं, “मसीहा” कहने लगे।
एक रात बारिश में एक महिला को प्रसव पीड़ा हुई। रास्ता बंद था, कोई एंबुलेंस नहीं आई। अर्जुन खुद कंधे पर उठाकर महिला को क्लिनिक लाया और सफल डिलीवरी की।
अगले दिन, जब महिला के पति ने पूछा — “नाम क्या रखें बच्चे का?”
तो सबने कहा — “अर्जुनी” — क्योंकि इस दुनिया में उसे लाने वाला कोई और नहीं, अर्जुन था।
9. सरकार की नज़र
अर्जुन की निस्वार्थ सेवा की गूंज अब दिल्ली तक पहुँच गई।
प्रधानमंत्री हेल्थ मिशन में उसे “राष्ट्रीय युवा स्वास्थ्य सेवक” का सम्मान मिला।
पर अर्जुन का जवाब वही था: “सम्मान मेरे लिए नहीं, उन गरीबों के लिए है जो कभी इलाज के नाम पर ठगे गए थे।”
सरकार ने गाँव में मेडिकल सेंटर खोलने के लिए फंड दिया — लेकिन अर्जुन ने उसे “पब्लिक ट्रस्ट” में बदला ताकि कोई राजनीति या भ्रष्टाचार उसमें न घुस पाए।
10. प्रेरणा का चक्र
आज अर्जुन के गाँव में:
- एक मॉडर्न क्लिनिक है
- हर शुक्रवार हेल्थ क्लास लगती है
- 50 से ज्यादा गाँवों के मरीज फ्री इलाज पाते हैं
- और… 200 से ज्यादा बच्चों को अर्जुन की टीम मुफ्त पढ़ाई करवाती है ताकि कोई और अर्जुन बन सके।
11. माँ का आशीर्वाद और गाँव की आँखें
माँ आज भी वही मोटी धोती पहनती है, लेकिन आँखों में गर्व है।
वो रोज़ सुबह क्लिनिक के सामने दीया जलाती है और कहती है —
“जिस बेटे को कभी दो रोटी मुश्किल से मिली, आज वो दूसरों की ज़िंदगी रोटी से भी ज़्यादा कीमती बना रहा है।”
गाँव के बुजुर्ग कहते हैं — “भगवान ने इस बार इंसान का रूप अर्जुन के रूप में भेजा है।”
निष्कर्ष
यह कहानी केवल अर्जुन की नहीं, बल्कि हर उस बच्चे की है जो मिट्टी में जन्म लेकर भी आसमान का सपना देखता है।
हर उस माँ की है जो भूखी रहकर भी बेटे को पढ़ाती है।
हर उस समाज की है, जो संघर्ष से उठकर सेवा का मंदिर बन सकता है।
👉 “गरीबी कभी मंज़िल की दीवार नहीं होती — बस मेहनत की चाबी चाहिए।”