खोया हुआ खज़ाना दोस्तों के साथ सफर lost treasure travel with friends


खोया हुआ खज़ाना दोस्तों के साथ सफर lost treasure travel with friends

शुरुवात से अंत तक जरूर पढ़ें।


📖 खोया हुआ खज़ाना – भाग 1: नक्शे का रहस्य

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गर्मियों की एक दोपहर थी। शहर के शोर-शराबे से दूर, पाँच दोस्त – शिवम, करण, नेहा, रोहन और सिया – हमेशा की तरह पुरानी हवेली में मिले थे। यह हवेली कस्बे के किनारे पर थी, जिसके बारे में लोग कहते थे कि वहाँ कभी कोई राज़ छिपा हुआ है। लेकिन इन दोस्तों के लिए यह जगह सिर्फ़ एडवेंचर और मौज-मस्ती की थी।

उस दिन भी वे हवेली के अंधेरे कमरों में घूमते हुए धूल भरे बक्से खोल रहे थे। तभी रोहन की नज़र एक लोहे के संदूक पर पड़ी, जिस पर जंग चढ़ी हुई थी। बड़ी मशक्कत के बाद जब उसने उसे खोला, तो सबकी आँखें चमक उठीं। अंदर से एक पुराना नक्शा और पीली पड़ चुकी डायरी निकली।

नक्शा अजीब था—उस पर घुमावदार रेखाएँ थीं, जंगल और पहाड़ों के निशान बने थे, और बीच में एक लाल क्रॉस का चिन्ह। डायरी के पहले पन्ने पर मोटे अक्षरों में लिखा था –
“खोया हुआ खज़ाना – केवल वही पाएगा, जो डर से आगे बढ़ेगा।”

सबके रोंगटे खड़े हो गए। नेहा ने घबराकर कहा –
“क्या सचमुच ये खज़ाने का नक्शा है?”

शिवम ने नक्शे को ध्यान से देखते हुए कहा –
“लगता तो वैसा ही है… और शायद ये हमारी ज़िंदगी का सबसे बड़ा एडवेंचर हो सकता है।”

सिया थोड़ी हिचकिचाई –
“लेकिन… अगर ये सच हुआ तो? और अगर ये जाल हुआ तो?”

करण हँसते हुए बोला –
“डरपोक मत बनो, सिया! सोचो, अगर हमें खज़ाना मिल गया तो? नाम, शोहरत, सब कुछ हमारे पास होगा।”

बहुत बहस के बाद सबने तय किया कि वे नक्शे के सुरागों को फॉलो करेंगे।


रहस्यमयी पहला सुराग

नक्शे पर सबसे पहला चिन्ह कस्बे से बाहर ‘सर्पवन’ नाम के जंगल की ओर इशारा कर रहा था। लोग कहते थे कि उस जंगल में रात को अजीब आवाज़ें सुनाई देती हैं और कोई अंदर जाता नहीं।

शाम ढलते ही पाँचों दोस्त अपने बैग, टॉर्च और जरूरी सामान लेकर निकल पड़े। रास्ता सुनसान और डरावना था। पेड़ों के बीच झींगुरों की आवाज़ गूँज रही थी। नक्शे में बने चिन्हों का पीछा करते हुए वे जंगल के बीच पहुँचे।

अचानक नेहा चीख पड़ी –
“देखो! पेड़ के तने पर कुछ लिखा है।”

पेड़ पर खून जैसे लाल रंग से एक वाक्य लिखा था –
“पहेली सुलझाओ, वरना अंधेरा तुम्हें निगल जाएगा।”

सबका गला सूख गया। फिर पेड़ के नीचे खुदी हुई एक पत्थर की पटिया दिखी। उस पर पहेली लिखी थी –

“जिसके पास पैर हैं, पर चल नहीं सकता।
जिसके पास मुँह है, पर बोल नहीं सकता।”

करण ने हँसते हुए कहा –
“अरे ये तो आसान है, ये नदी होगी।”

जैसे ही उसने जवाब बोला, सामने झाड़ियों के बीच से पानी की धार बहने लगी, और नक्शे का अगला रास्ता साफ़ हो गया।


पहला खतरा

वे आगे बढ़े ही थे कि अचानक चारों ओर से सरसराहट की आवाज़ आने लगी। अंधेरे में दो चमकती आँखें दिखाई दीं। फिर और भी कई आँखें! जंगल के भेड़ियों का झुंड धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रहा था।

सिया डर से काँपते हुए बोली –
“अब क्या करें? हम फँस गए!”

शिवम ने तुरंत टॉर्च की रोशनी उनकी आँखों पर डाली और सबको पत्थर उठाने को कहा। दोस्तों ने पूरी ताक़त से शोर मचाया और पत्थर फेंके। कुछ देर की जद्दोजहद के बाद भेड़िए पीछे हटे और अंधेरे में गायब हो गए।

सबने चैन की साँस ली, लेकिन अब ये साफ़ हो गया था कि यह रास्ता आसान नहीं होगा।


रहस्यमयी गुफा

नक्शा उन्हें जंगल से निकालकर एक पहाड़ी की तलहटी तक ले आया। वहाँ एक पुरानी गुफा थी। गुफा के दरवाज़े पर पत्थर से उकेरी हुई एक और लिखावट थी –
“जो अंदर जाएगा, वही सच पाएगा।
जो डर गया, बाहर का रास्ता कभी नहीं देखेगा।”

सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। अंदर जाने का ख्याल ही डरावना था। लेकिन खज़ाने का लालच और रोमांच दोनों उन्हें आगे धकेल रहे थे।

आख़िरकार पाँचों ने हिम्मत जुटाई और टॉर्च जलाकर गुफा के अंधेरे में कदम रखा।

जैसे ही वे अंदर बढ़े, ठंडी हवा का झोंका आया और पीछे का रास्ता अपने-आप बंद हो गया।

अब उनके पास सिर्फ़ एक ही रास्ता था—
अंधेरे की ओर आगे बढ़ना…


👉 (भाग 1 समाप्त)
अगले भाग में: जंगल की परछाइयाँ – जहाँ खज़ाने की राह और खतरनाक होगी।


📖 खोया हुआ खज़ाना – भाग 2: जंगल की परछाइयाँ

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गुफा के अंदर कदम रखते ही पाँचों दोस्तों की साँसें तेज़ हो गईं। अंधेरे में टॉर्च की हल्की-सी रोशनी भी गुम हो रही थी। दीवारों पर नमी टपक रही थी और अंदर से अजीब-सी गंध आ रही थी। हवा भारी और ठंडी थी, मानो किसी ने सदियों से खिड़की दरवाज़े बंद कर रखे हों।

करण ने हिम्मत जुटाकर कहा –
“दोस्तों, याद रखना… हमें यहाँ डरने नहीं, लड़ने आए हैं।”

शिवम ने नक्शे को ध्यान से देखा। उसमें गुफा के भीतर एक घुमावदार रास्ता बना था, जिसके अंत में एक चिह्न था। लेकिन वहाँ तक पहुँचने के लिए तीन दरवाज़े बने हुए थे – और नक्शे पर ये साफ़ लिखा था कि केवल एक ही दरवाज़ा सही है।


तीन दरवाज़ों की पहेली

गुफा के भीतर सचमुच तीन लोहे के दरवाज़े थे। हर दरवाज़े के ऊपर एक-एक वाक्य लिखा था:

  1. “इस दरवाज़े के पीछे केवल अंधेरा है।”

  2. “यह दरवाज़ा मौत की ओर ले जाता है।”

  3. “यह दरवाज़ा खज़ाने की ओर है।”

नेहा ने घबराकर कहा –
“अगर सब झूठ हुआ तो? अगर हम गलत दरवाज़ा चुन लें तो?”

सिया की आँखों में डर साफ़ झलक रहा था। रोहन चुपचाप चारों ओर देख रहा था। तभी उसने गुफा की दीवार पर हल्की-सी खरोंच देखी। खरोंचों को जोड़ने पर एक शब्द उभर आया – ‘दूसरा’

शिवम ने तुरंत कहा –
“इसका मतलब साफ़ है, हमें दूसरा दरवाज़ा खोलना होगा।”

करण चौंका –
“लेकिन उस पर तो साफ़ लिखा है – ‘यह दरवाज़ा मौत की ओर ले जाता है।’”

शिवम ने गंभीर स्वर में कहा –
“याद रखो, सच हमेशा छुपा होता है। अगर सीधा जवाब लिखा है, तो वही गलत होगा।”

काँपते हाथों से उन्होंने दूसरा दरवाज़ा खोला। दरवाज़ा कर्र-कर्र की आवाज़ करता हुआ खुला और भीतर से ठंडी हवा का झोंका आया।


अंधेरे की परछाइयाँ

अंदर जाते ही उन्हें लगा कि वे किसी भूलभुलैया में फँस गए हैं। चारों ओर घुप्प अंधेरा और दीवारों पर अजीब-सी आकृतियाँ उकेरी हुई थीं। कुछ आकृतियाँ इंसानों जैसी लग रही थीं, मानो वे किसी श्राप से पत्थर बन गए हों।

अचानक, गुफा में सन्नाटा टूट गया। किसी ने फुसफुसाकर कहा –
“वापस लौट जाओ…”

सभी के दिल धक-धक करने लगे। आवाज़ न पुरुष की थी, न स्त्री की – बल्कि मानो गुफा की दीवारों से निकल रही हो।

सिया ने रोते हुए कहा –
“मुझे यहाँ से निकलना है… मैं नहीं रह सकती यहाँ!”

रोहन ने उसका हाथ थाम लिया –
“हम सब साथ आए हैं, साथ ही बाहर निकलेंगे।”

जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते, उनके पीछे-पीछे परछाइयाँ चलने लगीं। टॉर्च की रोशनी डालने पर कोई नज़र नहीं आता, लेकिन रोशनी हटाते ही परछाइयों की संख्या बढ़ जाती।


मौत का जाल

काफी देर बाद वे एक बड़े कक्ष में पहुँचे। वहाँ फर्श पर चौकोर टाइलें बिछी थीं और सामने पत्थर की मूर्ति खड़ी थी, जिसके हाथ में सुनहरा डिब्बा था। डिब्बे पर नक्शे जैसा चिन्ह बना था।

करण ने जैसे ही डिब्बे की ओर कदम बढ़ाया, फर्श की एक टाइल दब गई और अचानक छत से नुकीले भाले गिरने लगे। सबने चीखकर एक तरफ़ छलाँग लगाई। भाले बाल-बाल उनके सिर के पास से गुज़रे।

शिवम हाँफते हुए बोला –
“ये जगह जालों से भरी है। अगर एक भी गलती हुई, तो हम सब मारे जाएँगे।”

अब उन्हें बहुत सोच-समझकर हर कदम रखना था। रोहन ने पत्थर की मूर्ति के नीचे देखा तो वहाँ एक शिलालेख था –
“सही रास्ता वही है, जो बिना आवाज़ के पार हो।”

उन्होंने गौर किया कि फर्श की कुछ टाइलें ढीली थीं और उन पर पैर रखते ही आवाज़ आती थी। धीरे-धीरे, सांस रोके, सावधानी से वे टाइलों को पार करते हुए आगे बढ़े। अंततः करण ने डिब्बा उठा लिया।

डिब्बा खोलने पर उसमें से एक चमकता हुआ पत्थर निकला। उस पर भी वही लाल क्रॉस का निशान था, जो नक्शे पर बना था।

नेहा ने कहा –
“लगता है यह कोई सुराग है, खज़ाने का नहीं।”

शिवम ने सिर हिलाया –
“हाँ, असली खज़ाना अभी बहुत दूर है।”


अंतिम सुराग की ओर

गुफा से बाहर निकलते ही वे एक चट्टान पर पहुँचे, जहाँ से सामने घना जंगल फैला हुआ था। नक्शे पर आख़िरी निशान इसी जंगल के बीच दिख रहा था।

लेकिन जैसे ही उन्होंने कदम बढ़ाया, चारों ओर अचानक तूफ़ानी हवा चलने लगी। पेड़ हिलने लगे, और दूर से ढोल जैसी आवाज़ें गूँजने लगीं। मानो कोई प्राचीन ताक़त उनके रास्ते में खड़ी हो।

सिया ने काँपते स्वर में कहा –
“मुझे लगता है… हमें कोई यहाँ तक आने नहीं देना चाहता।”

शिवम ने पत्थर को कसकर पकड़ लिया और बोला –
“अब चाहे जो हो, हमें खज़ाना पाना ही होगा। यही हमारी दोस्ती और हिम्मत की असली परीक्षा है।”

वे सब जंगल की गहराइयों में उतर गए, जहाँ हर पेड़, हर छाया मानो उनकी निगरानी कर रही थी…


👉 (भाग 2 समाप्त)
अगले और अंतिम भाग में: खज़ाने का सच – जहाँ उनकी यात्रा का असली राज़ खुलेगा और कहानी का रोमांचकारी अंत होगा।


📖 खोया हुआ खज़ाना – भाग 3: खज़ाने का सच

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गहरी रात थी। जंगल के बीच हवा सीटी बजा रही थी। पेड़ों की शाखाएँ ऐसे हिल रही थीं मानो कोई अदृश्य ताक़त उन्हें हिला रही हो। पाँचों दोस्त – शिवम, करण, नेहा, रोहन और सिया – अब तक बहुत थक चुके थे, लेकिन नक्शे पर बना अंतिम निशान उनकी आँखों के सामने घूम रहा था।

शिवम ने हाथ में चमकते पत्थर को कसकर पकड़ा। वह पत्थर मानो रास्ता दिखा रहा था। उसकी हल्की-सी चमक जंगल की अंधेरी झाड़ियों को चीरते हुए आगे बढ़ रही थी।


मौत की परछाइयाँ

जैसे ही वे जंगल के बीच पहुँचे, अचानक चारों ओर एक साथ आवाज़ें गूँज उठीं –
“खज़ाना… तुम्हारा नहीं है… लौट जाओ…”

सभी के कान सुन्न हो गए। अचानक पेड़ों के बीच से परछाइयाँ उभरने लगीं। वे इंसानी आकृतियों जैसी लग रही थीं, लेकिन चेहरा काला और आँखें लाल।

नेहा चीख पड़ी –
“ये… ये कौन हैं?”

एक परछाई फुसफुसाई –
“हम वही हैं… जो लालच में आए थे और कभी लौट नहीं पाए।”

सबके शरीर में कंपकंपी दौड़ गई। मानो ये जंगल उन लोगों की आत्माओं से भरा हुआ था, जो खज़ाने की खोज में यहाँ मारे गए थे।

करण ने हिम्मत जुटाई और चिल्लाया –
“हम लालच के लिए नहीं आए… हम सच जानने आए हैं!”

क्षणभर के लिए परछाइयाँ शांत हो गईं, और पत्थर की चमक और तेज़ हो उठी।


गुप्त मंदिर

पत्थर की रोशनी का पीछा करते हुए वे जंगल की गहराई में पहुँचे। वहाँ बेलों से ढका हुआ एक प्राचीन मंदिर था। दरवाज़ा आधा टूटा हुआ था और उस पर लिखा था –
“खज़ाना पाओगे, तो बलिदान भी देना होगा।”

सब एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
“क्या सचमुच यहाँ कोई खज़ाना है?” – सिया ने डरते हुए पूछा।

शिवम ने गंभीर स्वर में कहा –
“सच तो अंदर जाकर ही पता चलेगा।”

वे सब अंदर दाख़िल हुए। मंदिर के बीचों-बीच एक बड़ा कक्ष था, जहाँ सोने के सिक्कों के ढेर, सोने की मूर्तियाँ और कीमती जवाहरात चमक रहे थे।

सबके मुँह से एक साथ निकला –
“वाह…”

लेकिन तभी हवा का एक तेज़ झोंका आया और मंदिर का दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया। सामने एक काले वस्त्रों में लिपटी आकृति प्रकट हुई।


असली परीक्षा

आकृति ने गूँजती आवाज़ में कहा –
“खज़ाना लेने का हक़ हर किसी को नहीं है।
जो इसे चाहता है, उसे अपनी सबसे कीमती चीज़ की क़ुर्बानी देनी होगी।”

सब सहम गए।
“सबसे कीमती चीज़?” – रोहन ने कांपते हुए पूछा।

आकृति बोली –
“हाँ… सोना या जवाहरात नहीं।
बल्कि तुम्हारे दिल की सबसे कीमती चीज़।”

दोस्त चुप हो गए। फिर सिया की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने आगे बढ़कर कहा –
“अगर इस खज़ाने की वजह से हमारी जान और दोस्ती खतरे में पड़ रही है, तो मुझे ये खज़ाना नहीं चाहिए। मेरे लिए सबसे कीमती चीज़ है – मेरे दोस्त।”

आकृति कुछ पल के लिए शांत रही। फिर अचानक वह गायब हो गई और मंदिर की दीवार पर लिखावट उभर आई –
“सच्चा खज़ाना सोना-चाँदी नहीं, बल्कि दोस्ती और हिम्मत है।
तुमने यह साबित कर दिया है।”

क्षणभर में सोने-चाँदी के ढेर गायब हो गए और वहाँ सिर्फ़ एक छोटा-सा संदूक रह गया। संदूक खोलने पर उसमें वही चमकता हुआ पत्थर रखा था, लेकिन अब उस पर नया चिन्ह बना था – अनंत (∞)।

शिवम मुस्कुराया –
“यह खज़ाना असल में हमें यह समझाने के लिए था कि लालच मौत की ओर ले जाता है, लेकिन दोस्ती हमें हर अंधेरे से बचा सकती है।”


यात्रा का अंत

मंदिर का दरवाज़ा अपने-आप खुल गया और वे सब बाहर आ गए। जंगल की परछाइयाँ अब गायब थीं। हवा में एक अजीब-सी शांति थी।

थके हुए लेकिन गर्व से भरे पाँचों दोस्त वापस अपने कस्बे लौटे। उनके पास सोने-चाँदी का खज़ाना नहीं था, लेकिन उनके दिलों में ज़िंदगी का सबसे बड़ा खज़ाना था –
दोस्ती, हिम्मत और एक ऐसा राज़, जिसे उन्होंने खुद जिया था।


✅ निष्कर्ष

“खोया हुआ खज़ाना” सचमुच सोना-चाँदी नहीं था। असली खज़ाना था –
डर पर जीत पाना, जालों से बचकर निकलना, और सबसे बढ़कर – दोस्ती को लालच से ऊपर रखना।


📕 कहानी समाप्त
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