समय यात्रा की भूलभुलैया Labyrinth of Time Travel
शुरुवात से अंत तक जरूर पढ़ें।
भाग 1 : रहस्यमयी घड़ी
चारों दोस्त — अर्जुन, रीना, विक्रांत और सिया — कॉलेज के बाद की छुट्टियाँ बिताने हिल स्टेशन की ओर निकले थे। पहाड़ों से घिरे रास्तों पर गाड़ियाँ बहुत कम दिखाई दे रही थीं। उनके हाथों में ट्रेकिंग बैग और चेहरों पर रोमांच का उत्साह था।
अर्जुन सबमें सबसे शांत और समझदार था, वही अक्सर लीडर का रोल निभाता। रीना थोड़ी डरपोक मगर बहुत जिज्ञासु थी। विक्रांत मज़ाकिया लेकिन उतावला, और सिया रोमांच पसंद लड़की, जो हर अनजान जगह को खोजने के लिए हमेशा तैयार रहती थी।
जंगल से गुजरते हुए उन्होंने एक ऊँचे पहाड़ के किनारे पर एक पुरानी हवेली देखी। वह हवेली किसी डरावनी फिल्म की तरह वीरान और टूटी-फूटी थी। खिड़कियों पर जाले लटके थे और दरवाज़ा आधा टूटा हुआ, जैसे सालों से किसी ने खोला ही न हो।
सिया (उत्साहित होकर): “वाह! देखो, कैसी रहस्यमयी जगह है। चलो अंदर चलते हैं।”
रीना (घबराकर): “नहीं… मुझे ये ठीक नहीं लग रहा। पता नहीं अंदर क्या हो।”
विक्रांत (हँसते हुए): “अरे डरपोक मत बनो रीना, ये तो एडवेंचर है।”
अर्जुन (सोचते हुए): “ठीक है, लेकिन सब सावधान रहना।”
चारों धीरे-धीरे अंदर गए। हवेली के अंदर धूल और मकड़ी के जाले थे। पुरानी लकड़ी की सीढ़ियाँ चरमराती थीं और हवा से दरवाज़े चरमराते हुए बंद हो जाते थे। कमरे में एक पुरानी लकड़ी की अलमारी पड़ी थी, जिस पर धूल जमी हुई थी।
विक्रांत ने अलमारी खोली तो उसमें से एक सुनहरी पॉकेट वॉच (घड़ी) चमक उठी। वह घड़ी साधारण नहीं थी। उस पर अजीब-सी नक्काशी बनी हुई थी और उसके पीछे एक पंक्ति खुदी थी:
“समय सिर्फ चलने के लिए नहीं, खो जाने के लिए भी होता है।”
रीना डरते हुए पीछे हट गई।
रीना: “इसे मत छूओ विक्रांत… ये मुझे अजीब लग रही है।”
विक्रांत (मुस्कुराते हुए): “अरे, ये तो बस एक पुरानी चीज़ है। देखो, कितनी खूबसूरत लग रही है।”
अर्जुन (गंभीर स्वर में): “हो सकता है ये कीमती हो, पर हमें सावधान रहना चाहिए।”
लेकिन विक्रांत ने सबकी बात अनसुनी करते हुए घड़ी का बटन दबा दिया।
अचानक से पूरा कमरा हिलने लगा। दीवारों से तेज़ आवाज़ें आने लगीं, मानो कोई तूफ़ान हवेली के अंदर फँस गया हो। हवा इतनी तेज़ हो गई कि खिड़कियाँ टूट गईं और रोशनी चमकने लगी। चारों ज़मीन पर गिर पड़े और उनकी आँखों के सामने सब कुछ अंधेरा हो गया।
जब होश आया तो उन्होंने देखा कि वे अब हवेली में नहीं थे। वे एक पुराने ज़माने के बाज़ार में खड़े थे। लोग घोड़ागाड़ी चला रहे थे, दुकानों पर लालटेन जली थीं और सब पुराने कपड़ों में थे।
सिया (हैरान होकर): “ये… ये कहाँ आ गए हम?”
अर्जुन (धीमी आवाज़ में): “मुझे लगता है… हम समय में पीछे चले गए हैं।”
विक्रांत (हँसने की कोशिश करते हुए): “मतलब… ये घड़ी हमें टाइम ट्रैवल करा रही है?”
रीना (डरी हुई): “ये मज़ाक नहीं है विक्रांत… ये बहुत खतरनाक है।”
चारों को अब अहसास हुआ कि ये घड़ी कोई साधारण चीज़ नहीं, बल्कि एक समय की भूलभुलैया है।
भाग 2 : अलग-अलग समय की कैद
अब उनकी असली यात्रा शुरू हुई। वे घड़ी का बटन दबाकर वापस लौटने की कोशिश करते, लेकिन हर बार वे किसी नए समय में पहुँच जाते।
पहला ठिकाना — मुग़ल काल
घड़ी घुमाने पर वे अचानक मुग़ल काल में जा पहुँचे। सामने एक विशाल महल था, चारों ओर सैनिक और हाथी-घोड़े। सैनिकों ने उनके अजीब कपड़े देखकर उन्हें पकड़ लिया।
सैनिक (गंभीर स्वर में): “कौन हो तुम लोग? और ये अजीब पोशाकें क्यों?”
रीना (काँपते हुए): “हम… हम रास्ता भटक गए थे।”
विक्रांत (धीरे से अर्जुन से): “अगर ये लोग हमें जेल में डाल देंगे तो?”
अर्जुन (धीरे से): “घड़ी… घड़ी दबाओ जल्दी!”
जैसे ही विक्रांत ने घड़ी दबाई, अचानक चारों तेज़ रोशनी में गायब हो गए। सैनिक हैरान रह गए।
दूसरा ठिकाना — भविष्य का शहर 2100
अब वे एक चमकदार भविष्य के शहर में थे। ऊँची-ऊँची इमारतें, उड़ने वाली गाड़ियाँ और हर जगह रोबोटिक पुलिस।
सिया (हैरान होकर): “ये… ये तो किसी साइंस-फिक्शन मूवी जैसा लग रहा है।”
अचानक रोबोटिक आवाज़ आई—
रोबोट: “अनधिकृत टाइम ट्रैवलर्स… एलिमिनेट!”
चारों घबरा गए और दौड़ते हुए एक गली में छिप गए।
विक्रांत (तेज़ साँस लेते हुए): “ये जगह तो और भी खतरनाक है!”
अर्जुन: “घड़ी दबाओ, वरना ये रोबोट हमें पकड़ लेंगे।”
फिर से घड़ी चमकी और वे गायब हो गए।
तीसरा ठिकाना — 1942 का भारत
इस बार वे एक छोटे से गाँव में पहुँचे, जहाँ क्रांतिकारी स्वतंत्रता संग्राम की गुप्त बैठक कर रहे थे।
क्रांतिकारी: “ये लोग कौन हैं? इन्हें अंग्रेजों का जासूस समझो!”
अर्जुन (बचाव में): “नहीं! हम जासूस नहीं हैं… हम कहीं और से आए हैं!”
लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं मानी। चारों को बाँध दिया गया। जब मौका मिला, विक्रांत ने घड़ी को फिर दबाया और वे वहाँ से भी निकल गए।
कई बार समय बदलते-बदलते वे थक चुके थे। वे एक सुनसान जगह पर बैठे। घड़ी अब अजीब तरह से चमक रही थी, जैसे चेतावनी दे रही हो।
अर्जुन (गंभीर होकर): “ये घड़ी हमें यूँ ही समय के जाल में घुमा रही है।”
रीना (धीरे से): “तो हम वापस कैसे जाएँगे?”
सिया (सोचते हुए): “शायद… वहीं लौटना होगा जहाँ से हमने इसे उठाया था।”
विक्रांत: “मतलब… फिर से वही हवेली।”
भाग 3 : अंतिम निर्णय
घड़ी ने इस बार उन्हें फिर उसी पुरानी हवेली में पहुँचा दिया। वही कमरा, वही अलमारी। लेकिन अब घड़ी तेज़ी से घूम रही थी और उसमें से एक रहस्यमयी आवाज़ आई—
“वापसी संभव है… पर एक को पीछे छोड़ना होगा।”
चारों सन्न रह गए।
रीना (रोते हुए): “नहीं! ये झूठ है… हम सब साथ जाएंगे।”
सिया (काँपते हुए): “नहीं… मैं किसी को खोना नहीं चाहती।”
अर्जुन: “हमने साथ आने का वादा किया था। हम किसी को पीछे नहीं छोड़ेंगे।”
विक्रांत कुछ देर चुप रहा। उसने सबको देखा और फिर धीमी आवाज़ में बोला—
विक्रांत: “शायद यही मेरी किस्मत है। तुम लोग जाओ… मैं यहीं रहूँगा।”
रीना (चिल्लाकर): “नहीं विक्रांत! ऐसा मत करो!”
विक्रांत (मुस्कुराकर): “कभी-कभी किसी को क़ुर्बानी देनी पड़ती है।”
उसने घड़ी सेट की और बाकी तीन दोस्तों को समय के भंवर में धकेल दिया।
वर्तमान में वापसी
अर्जुन, रीना और सिया ने आँखें खोलीं तो वे फिर से 2025 के वर्तमान में थे। वही हवेली, वही कमरा। लेकिन अब अलमारी खाली थी।
अचानक दीवारों पर घड़ी की टिक-टिक गूँजने लगी।
और हवा में विक्रांत की हल्की सी हँसी सुनाई दी…
“कभी-कभी समय किसी को कैद कर लेता है… हमेशा के लिए।”
तीनों एक-दूसरे को देखते रह गए। हवेली के बाहर हवा तेज़ चलने लगी और दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।